सामाजिक_विज्ञान/राजव्यवस्था – कक्षा 11 – Ncert अध्याय 6 — न्यायपालिका : Political Science/Constitution/Indian Polity NCERT Based Questions Part 9 For UPSC, IAS, RAS, State PCS

Indian Polity Quiz 9, Indian Polity/Constitution Questions for IAS RAS SSC STATE PCS



In this post we are going to share  सामाजिक_विज्ञान/राजव्यवस्था – कक्षा 11 – Ncert अध्याय 6 — न्यायपालिका, Political Science/Constitution/Indian Polity NCERT Based Questions Part 9. These Questions are important For UPSC, IAS, RAS, RPSC, UPPSC, ,MPPSC, BPSC, Other State PCS. This Practice set have Multiple choice questions, which are from Indian Polity/Indian Constitution Subject. These Indian Polity/Indian Constitution Questions are made on the basis of previously asked questions in UPSC, IAS, RAS, UPPSC, MPPSC, BPSC, and Other PSC exams.

Indian Polity/Indian Constitution/Political Science Questions in Hindi



प्रश्न 1:- न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि-
1. स्वेच्छाचारिता या उत्तरदायित्व का अभाव होना।
2. विधायिका व कार्यपालिका द्वारा न्यायपालिका के कार्यों में बाधा न पहुँचाना।
3. सरकार के अन्य अंगों द्वारा न्यायपालिका के निर्णयों में हस्तक्षेप न करना।
4. न्यायाधीश द्वारा बिना भय या भेदभाव के अपना कार्य करना।
कूटः
A) केवल 1, 2 और 4
B) केवल 1 और 4
C) केवल 2, 3 और 4 
D) उपरोक्त सभी

उत्तरः (c)
व्याख्याः #न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ स्वेच्छाचारिता या उत्तरदायित्व का अभाव नहीं होता है। अतः कथन 2, 3 और 4 न्यायपालिका की स्वतन्त्रता की व्याख्या करते हैं।


प्रश्न 2:- सर्वोच्च न्यायालय/उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः
1. न्यायाधीशों की नियुक्तियों के मामलों में विधायिका को सम्मिलित नहीं किया जाता है।
2. न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिये किसी व्यक्ति के पास वकालत का अनुभव या कानून विशेषज्ञ होना आवश्यक है।
3. न्यायाधीशों का कार्यकाल निश्चित नहीं होता है अतः इसे कम या ज़्यादा किया जा सकता है।
4. न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते के लिये विधायिका की स्वीकृति ली जाती है।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सत्य हैं?
A) केवल 1 और 2
B) केवल 1, 2 और 4
C) केवल 1 और 4
D) उपरोक्त सभी

उत्तरः (a)
व्याख्याः #न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामलों में विधायिका को सम्मिलित नहीं किया गया है ताकि इसे दलगत राजनीति से अलग रखा जा सके। न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिये किसी व्यक्ति को वकालत का अनुभव या कानून विशेषज्ञ होना आवश्यक है। अतः कथन (1) व (2) दोनों सत्य हैं। न्यायाधीशों का कार्यकाल निश्चित होता है, उनके कार्यकाल को कम नहीं किया जा सकता, कार्यकाल की सुरक्षा के कारण न्यायाधीश बिना भय या भेदभाव के अपना कार्य कर सकते हैं। अतः कथन 3 असत्य है। न्यायपालिका, कार्यपालिका या विधायिका पर वित्तीय रूप से निर्भर नहीं है। संविधान के अनुसार न्यायाधीश के वेतन और भत्ते के लिये विधायिका की स्वीकृति नहीं ली जाएगी। अतः कथन (4) भी गलत है।


प्रश्न 3:- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः
1. न्यायाधीशों के कार्यों और निर्णयों की व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जा सकती है।
2. संसद न्यायाधीशों के आचरण पर केवल तभी चर्चा कर सकती है जब वह उनको हटाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही हो।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन असत्य है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

उत्तरः (d)
व्याख्याः दिये गए दोनों कथन सत्य हैं। #न्यायाधीशों_के कार्यों और निर्णयों की व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जा सकती, यदि कोई ऐसा करता है तो न्यायपालिका को उसे दण्डित करने का अधिकार है। इस अधिकार से न्यायाधीशों को सुरक्षा मिलती है। संसद भी न्यायाधीशों के आचरण पर केवल तभी चर्चा कर सकती है जब वह उनको हटाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही हो। इससे न्यायपालिका आलोचना के भय से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से निर्णय दे सकती है।


प्रश्न 4:- न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः
1. सर्वोच्च न्यायालय/उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से कदाचार साबित होने या अयोग्यता की दशा में ही हटाया जा सकता है।
2. उनकी नियुक्ति में कार्यपालिका की कोई भूमिका नहीं है।
3. इनको हटाने में विधायिका की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन असत्य है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 1 और 3
C) 1 और 2 दोनों
D) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तरः (b)
व्याख्याः #सर्वोच्च_न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से सिर्फ कदाचार साबित होने या अयोग्यता की दशा में ही हटाया जा सकता है। जब तक संसद के सदस्यों में आम सहमति न हो तब तक किसी न्यायाधीश को हटाया नहीं जा सकता। उनकी नियुक्ति में कार्यपालिका की अप्रत्यक्ष महत्त्वपूर्ण भूमिका है वहीं उनको हटाने की शक्ति विधायिका के पास है। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता बचाए रखने तथा शक्ति-संतुलन बनाए रखने हेतु ऐसा किया गया है। अतः कथन 2 असत्य है।


प्रश्न 5:- भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?
1. इसके फैसले सभी अदालतों को मानने होते हैं।
2. यह उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का तबादला कर सकता है।
3. यह किसी अदालत का मुकदमा अपने पास मँगवा सकता है।
4. यह किसी एक उच्च न्यायालय में चल रहे मुकदमे को दूसरे उच्च न्यायालय में भिजवा सकता है।
कूटः
A) केवल 1
B) केवल 1 और 3
C) केवल 1, 3 और 4
D) उपरोक्त सभी।

#उत्तरः (d)


प्रश्न 6:- उच्च न्यायालयों के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः
1. ये निचली अदालतों के फैसले पर की गई अपील की सुनवाई कर सकते हैं।
2. ये मौलिक अधिकारों को बहाल करने के लिये रिट जारी कर सकते हैं।
3. ये अन्य राज्यों के क्षेत्राधिकार में आने वाले मुकदमों का निपटारा भी कर सकते हैं।
4. ये अपने अधीनस्थ अदालत का पर्यवेक्षण और नियंत्रण करते हैं।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 1, 2 और 4
C) केवल 1 और 4
D) उपरोक्त सभी।

उत्तरः (b)
व्याख्याः कथन 3 असत्य है क्योंकि #उच्च_न्यायालय सिर्फ अपने राज्य क्षेत्र में आने वाले कार्य मुकदमों का ही निपटारा कर सकता है। अतः अन्य कथन 1,2 और 4 सत्य हैं।


प्रश्न 7:- अधीनस्थ न्यायालय के सन्दर्भ में सत्य कथन है/हैं-
1. जिले में दायर मुकदमों की सुनवाई करता है।
2. गम्भीर किस्म के अपराधिक मामलों में फैसला देता है।
3. फौज़दारी और दीवानी के मुकदमों पर विचार करता है।
कूटः
A) केवल 3
B) केवल 2 और 3
C) केवल 1 और 3
D) उपरोक्त सभी।

उत्तरः (d)
व्याख्याः #ज़िले में दायर मुकदमों की सुनवाई करना, गम्भीर किस्म के अपराधिक मामलों पर फैसला देना तथा निचली अदालतों के फैसले पर की गई अपील की सुनवाई करना, फौज़दारी और दीवानी के मुकदमों पर विचार करना अधीनस्थ अदालत के कार्य हैं।


प्रश्न 8:- भारत के सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत सम्मिलित हैं-
1. मौलिक क्षेत्राधिकार
2. अपीली क्षेत्राधिकार
3. सलाहकारी क्षेत्राधिकार
4. रिट सम्बन्धी क्षेत्राधिकार
कूटः
A) केवल 1 और 4
B) केवल 1, 3 और 4
C) केवल 1, 2 और 4 
D) उपरोक्त सभी।

उत्तरः (d)
व्याख्याः #सर्वोच्च_न्यायालय के क्षेत्राधिकार इस प्रकार हैः
1. मौलिक क्षेत्राधिकार (आरंभिक) – अनुच्छेद-131
2. अपीलीय क्षेत्राधिकार – अनुच्छेद-132, 133, 134, 134 (क) एवं अनुच्दछेद – 136
3. सलाहकारी क्षेत्राधिकार – अनुच्छेद – 143
4. रिट संबंधी क्षेत्राधिकार – अनुच्छेद- 32


प्रश्न 9:- भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मौलिक क्षेत्राधिकार से सम्बंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः
1. यह अधिकार उसे संघीय मामलों में एक निर्णायक की भूमिका प्रदान करता है।
2. केन्द्र व राज्यों के बीच तथा विभिन्न राज्यों में परस्पर कानूनी विवादों को हल करने की ज़िम्मेदारी सर्वोच्च न्यायालय की है।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

उत्तरः (c)
व्याख्याः दिये गए दोनों कथन सत्य हैं। संविधान के #अनुच्छेद131 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक या प्रारंभिक क्षेत्राधिकार प्राप्त है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त मौलिक क्षेत्राधिकार उसे संघीय मामलों में निर्णायक की भूमिका प्रदान करता है। केन्द्र तथा राज्यों के बीच और विभिन्न राज्यों के मध्य उत्पन्न कानूनी विवादों को हल करने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त है। इसे मौलिक क्षेत्राधिकार कहा ही इसलिये जाता है क्योंकि ऐसे मामलों की सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय ही सुनवाई कर सकता है, न तो उच्च न्यायालय और न ही अधीनस्थ न्यायालयों में इसकी अपील की जा सकती है।


प्रश्न 10:- सर्वोच्च न्यायालय के अपीली क्षेत्राधिकार सम्बन्धित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः
1. कोई भी व्यक्ति उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।
2. कोई भी व्यक्ति किसी भी मामले में उच्च न्यायालय द्वारा अपील करने की आज्ञा मिलने पर ही सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है अन्यथा नहीं।
3. इस क्षेत्राधिकार का अर्थ है कि सर्वोच्च न्यायालय पूरे मामले पर पुनर्विचार करेगा और कानूनी मुद्दों की दोबारा जाँच करेगा।
उपरोक्त कथनों में से कौन-से कथन सत्य हैं?
A) केवल 1
B) केवल 1 और 3
C) केवल 1 और 2
D)उपरोक्त सभी।

उत्तरः (b)
व्याख्याः दिये गए कथनों में केवल कथन 1 और 3 सत्य हैं जबकि कथन 2 असत्य हैं। क्योंकि उच्च न्यायालय को अपील के लिये यह #प्रमाणपत्र देना पड़ता है कि वह मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने लायक है अर्थात् उसमें संविधान या कानून की व्याख्या करने सम्बन्धी कोई गम्भीर मामला उलझा है। यदि किसी मामले में उच्च न्यायालय अपील की आज्ञा न दे तब भी सर्वोच्च न्यायालय के पास यह शक्ति है कि वह उस मुकदमे में की गई अपील को विचार के लिये स्वीकार कर ले।


प्रश्न 11:- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः
1. भारत का राष्ट्रपति लोकहित या संविधान की व्याख्या से सम्बन्धित किसी विषय को सर्वोच्च न्यायालय के पास परामर्श हेतु भेज सकता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय लोकहित या संविधान की व्याख्या सम्बन्धित किसी विषय पर न तो सलाह देने हेतु बाध्य है और न ही राष्ट्रपति उस सलाह को मानने हेतु बाध्य होगा।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

उत्तरः (c)
व्याख्याः दिये गए दोनों कथन सर्वोच्च न्यायालय के सलाह सम्बन्धी क्षेत्राधिकार की व्याख्या करते हैं अतः दोनों कथन सत्य हैं।
संविधान के #अनुच्छेद143 के तहत भारत के राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय से विधि या तथ्य से सम्बंधित सलाह माँग सकता है।


प्रश्न 12:- जनहित याचिका के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं:
1. यह न्यायिक सक्रियता का सबसे प्रभावी साधन है।
2. इनके द्वारा न्यायालय ने उन विषयों पर भी रुचि दिखाई जिन्हें लेकर कुछ वर्ग आसानी से अदालत नहीं जा सकते थे।
3. इसने न्याय व्यवस्था को लोकतांत्रिक तथा कार्यपालिका को उत्तरदायी बनने को बाध्य किया है।
4. इनके द्वारा न्यायपालिका की सक्रियता से कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों के बीच का अन्तर धुँधला हुआ है।
कूटः
A) केवल 1
B) केवल 1, 2 और 4
C) केवल 1 और 3
D) उपरोक्त सभी।

उत्तरः (d)
व्याख्याः सभी कथन सत्य हैं।
#जनहित_याचिका न्यायिक सक्रियता का सबसे प्रभावी साधन हो गई है। किसी के द्वारा मुकदमा करने पर उस मुद्दे पर विचार करने के साथ-साथ न्यायपालिका ने अखबार में छपी खबरों और डाक से प्राप्त शिकायतों को आधार बनाकर उन पर विचार करना शुरू कर दिया। यद्यपि बाद में न्यायालय ने पत्रों को याचिका के रूप में स्वीकार करने की प्रथा समाप्त कर दी। 
1980 के बाद जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता के द्वारा न्यायपालिका ने उन मामलों में भी रुचि दिखाई जहाँ समाज के कुछ वर्ग के लोग आसानी से अदालत की शरण नहीं ले सकते। न्यायालय ने पीड़ित व्यक्ति की ओर से किसी अन्य को भी याचिका दायर करने का हक दिया। इसने न्याय व्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाया और कार्यपालिका उत्तरदायी बनने पर बाध्य हुई। चुनाव प्रणाली को भी इसने ज़्यादा मुक्त और निष्पक्ष बनाने का प्रयास किया है। 
न्यायिक सक्रियता से विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों के बीच का अन्तर धुंधला हुआ है।
भारत में जनहित याचिका (पी.आई.एल) या सामाजिक व्यवहार याचिका (Social Action litigation) का प्रारंभ 1980 के दशक में तत्कालीन न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर और न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती के द्वारा किया गया।


प्रश्न 13:- न्यायपालिका के अधिकारों के सम्बन्ध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. न्यायपालिका को व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया है।
2. सर्वोच्च न्यायालय के पास किसी मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कानून को असंवैधानिक घोषित कर उसे लागू होने से रोकने का अधिकार है।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

उत्तरः(c)
व्याख्याः दिये गए दोनों कथन सत्य हैं। न्यायपालिका को व्यक्ति के #अधिकारों की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया है। सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत व्यक्ति के मूल अधिकारों की रक्षा के लिये रिट निकाल सकता है, जबकि उच्च rन्यायालय संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत मूल अधिकारों के अतिरिक्त अन्य मामलों में भी रिट निकाल सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के संरक्षक के साथ-साथ संविधान का भी संरक्षक माना गया है। इसे संविधान का निर्वचन/व्याख्या करने की शक्ति प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद-13 के तहत मौलिक अधिकारों के विरुद्ध किसी कानून को असंवैधानिक या शून्य घोषित कर सकता है।


प्रश्न 14:- नीचे दी गई सूची I को सूची II से सुमेलित कीजियेः
सूची-I सूची-II 
A. सर्वोच्च न्यायालय के रिट सम्बन्धी अधिकार 1. अनुच्छेद 124 
B. उच्च न्यायालयों के रिट सम्बन्धी अधिकार 2. अनुच्छेद 137
C. उच्चतम न्यायालय की अपने आदेश या निर्णय के पुनरावलोकन की शक्ति 3. अनुच्छेद 32
D. उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन 4.अनुच्छेद 226
कूटः
A B C D
A) 
3 4 2 1
B) 
2 1 3 4
C) 
3 1 4 2
D) 
3 1 2 4

उत्तरः(a)
व्याख्याः 
#अनुच्छेद-32 : सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के संरक्षण के लिये रिट निकालने की शक्ति।
अनुच्छेद-226 : उच्च न्यायालय को रिट निकालने की शक्ति।
अनुच्छेद-124 : उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन।
अनुच्छेद-137 : सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए अपने निर्णयों को पुनर्विलोकन करने की शक्ति।


प्रश्न 15:- सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. इसके माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय विधायिका द्वारा पारित किसी भी कानून की संवैधानिकता जाँच सकता है।
2. इस शक्ति के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय संविधान के विपरीत कानूनों को गैर-संवैधानिक घोषित कर सकता है।
3. संविधान में कहीं भी न्यायिक पुनरावलोकन शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।
4. ये शक्ति राज्यों की विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों पर भी लागू होती है।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सत्य हैं?
A) केवल 1 और 4
B) केवल 1 और 2
C) केवल 1, 2 और 3 
D) उपरोक्त सभी।

उत्तरः (d)
व्याख्याः दिये गए सभी कथन सत्य हैं। भारत में न्यायिक #पुनर्विलोकन सिद्धांत को अमेरिकी संविधान से ग्रहण किया है। भारत के संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन की कहीं भी स्पष्ट रूप से चर्चा नहीं की गई है, किन्तु संविधान के अनुच्छेद-13, 32 एवं 226 अप्रत्यक्ष रूप से न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति न्यायपालिका को सौंपती है।


प्रश्न 16:- निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. संविधान के मूल ढाँचे का सिद्धान्त सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती (1973) केस के निर्णय में दिया था।
2. सर्वोच्च न्यायालय ही यह घोषित करता है कि कौन-सा भाग संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा है और कौन-सा नहीं है। कार्यपालिका को इस विषय में कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन असत्य है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

उत्तरः (d)
व्याख्याः दिये गए दोनों कथन सत्य हैं। भारतीय संविधान की मूल ढाँचा/आधारिक ढाँचा का सिद्धांत पहली बार #केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य वाद, 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने दिया और कहा कि न्यायालय समय-समय पर मूल ढाँचा घोषित करेगी। इसके बाद मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ वाद 1980 में मूल ढाँचा के सिद्धांत को पुनः दोहराया गया।
केशवानन्द भारती वाद में गठित संवैधानिक पीठ अब तक का सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ है। इसमें कुल 13 न्यायाधीश थे।


प्रश्न 17:- संसदीय व्यवस्था के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः
1. इसमें संसद को अपना संचालन खुद करने तथा अपने सदस्यों का व्यवहार नियंत्रित करने की शक्ति है।
2. इसमें विधायिका को विशेषाधिकार के हनन का दोषी पाए जाने पर भी अपने सदस्यों को दंडित करने का अधिकार नहीं है।
उपरोक्त कथनों में कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2

उत्तरः (a)
व्याख्याः कथन 1 सत्य है, जबकि 2 असत्य क्योंकि संसदीय व्यवस्था में विधायिका को#विशेषाधिकार के हनन का दोषी पाए जाने पर अपने सदस्यों को दण्डित करने का अधिकार है।

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